एक संक्षिप्त जीवनी

परम पावन चौदहवें दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो २९ मई २०११ तक तिब्बत के राजकीय प्रमुख रहे और उपरोक्त तिथि पर उन्होंने अपनी सारी राजनीतिक शक्तियाँ तथा उत्तरदायित्व प्रजातांत्रिक तरीके से चुने हुए तिब्बती नेतृत्व को हस्तांतरित किये। अब वे केवल तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। उनका जन्म ६ जुलाई १९३५ को उत्तरी तिब्बत में आमदो के एक छोटे गाँव तकछेर में एक कृषक परिवार में हुआ था। दो वर्ष की आयु में ल्हामो दोंडुब नाम का वह बालक तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में पहचाना गया। ऐसा विश्वास है कि दलाई लामा अवलोकितेश्वर या चेनेरेज़िग का रूप हैं जो कि करुणा के बोधिसत्त्व तथा तिब्बत के संरक्षक संत हैं।  बोधिसत्त्व प्रबुद्ध सत्त्व हैं जिन्होंने अपना निर्वाण स्थगित कर मानवता की सेवा के लिए पुनः जन्म लेने का निश्चय लिया है।

तिब्बत में शिक्षा

परम पावन की मठीय शिक्षा छह वर्ष की आयु में प्रारंभ हुई। उनके पाठ्यक्रम में पाँच महाविद्या तथा पाँच लघु विद्या थे। महाविद्या थे प्रमाण विद्या, शिल्प विद्या, शब्द विद्या, चिकित्सा विद्या तथा आध्यात्मिक विद्या, जो अन्य पाँच वर्गों में विभक्त थाः प्रज्ञापारमिता, माध्यमिक, विनय, अभिधर्म और प्रमाण। पाँच लघु विद्या थे काव्य, नाटक, ज्योतिष, छन्द  तथा अभिधान। सन् १९५९ में२३ वर्ष की आयु में वे ल्हासा के जोखंग मंदिर में मोनलम (प्रार्थना) उत्सव के समय अपनी अंतिम परीक्षा में बैठे। उन्होंने अपनी परीक्षा में बड़े ही सम्मान के साथ सफलता प्राप्त की और उन्हें गेशे ल्हारम्पा की उपाधि जो कि उच्चतम उपाधि है और बौद्ध दर्शन में डॉक्टर के समकक्ष है, से सम्मानित किया गया।

नेतृत्व का उत्तरदायित्व

चीन द्वारा १९४९ में तिब्बत पर आक्रमण के बाद १९५० में परम पावन से पूरी राजनैतिक सत्ता संभालने का आग्रह किया गया। १९५४ में वे माओ च़े तुंग तथा अन्य चीनी नेताओं जिनमें देंग ज़ियोपिंग और चाउ एन लाइ भी शामिल थे, के साथ शांति वार्ता के लिए बीजिंग गए। पर अंततः १९५९ में चीनी सेना द्वारा ल्हासा के तिब्बती राष्ट्रीय संघर्ष को बड़ी क्रूरता से कुचले जाने के कारण परम पावन को शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। तबसे वे उत्तरी भारत के धर्मशाला में निवास करते हैं जो कि निर्वासित तिब्बती राजनैतिक प्रशासन का केन्द्र है।

चीनी आक्रमण के बाद परम पावन ने तिब्बत के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तिब्बत पर १९५९, १९६१, और १९६५ में तीन प्रस्ताव पारित किए।

प्रजातंत्रीय प्रक्रिया

१९६३ में परम पावन ने तिब्बत के प्रजातंत्रीय संविधान का एक प्रारूप प्रस्तुत किया जिसके बाद हमारी प्रशासनिक व्यवस्था को प्रजातांत्रिक बनाने के लिए कई संशोधन हुए। इस सुधार के फलस्वरूप जो नया प्रजातंत्रीय संविधान घोषित हुआ वह शरणार्थी तिब्बतियों के संविधान के नाम से जाना जाता है।  इस संविधान में अभिव्यक्ति, विश्वास, सभा तथा घूमने फिरने की स्वतंत्रता प्रतिष्ठापित है। इसमें जो शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं उनके प्रति भी तिब्बती प्रशासन के प्रकार्यों के लिए दिशा निर्देश दिए गए हैं।    

१९९२ में परम पावन ने भविष्य के स्वतंत्र तिब्बत के संविधान के दिशा निर्देश प्रकाशित किए। उन्होंने घोषणा की कि जब तिब्बत स्वतंत्र होगा तो तात्कालिक कार्य एक अंतरिम सरकार की स्थापना करना होगा जिसका पहला कार्य एक संवैधानिक सभा का चुनाव होगा जो तिब्बत की प्रजातंत्र संविधान की रूप रेखा बनाकर उसे स्वीकार करेगी। उस दिन परम पावन अपने सभी ऐतिहासिक तथा राजनैतिक सत्ता अंतरिम राष्ट्रपति को सौंप देंगे और एक साधारण नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करेंगे। परम पावन ने यह भी कहा कि तिब्बत जो कि उच़ंग, आमदो और खम तीन पारम्परिक प्रदेशों से बना है वह संघीय तथा प्रजातान्त्रिक होगा।

मई १९९० में परम पावन द्वारा जो सुधार सुझाए गए थे वह तिब्बती समुदाय के लिए एक सच्चे शरणार्थी प्रजातंत्रीय प्रशासन के रूप में साकार हुए। तिब्बती मंत्री परिषद् (कशाग) जिसकी नियुक्ति उस समय तक परम पावन किया करते थे, उसे  शरणार्थी तिब्बती संसद के साथ भंग कर दिया गया। उसी वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप और३३ से अधिक देशों के शरणार्थी तिब्बतियों ने विस्तृत ग्यारहवीं तिब्बती संसद के लिए एक व्यक्ति एक वोट के आधार पर ४६सदस्यों का चुनाव किया। संसद ने अपनी ओर से मंत्रिमंडल के नए सदस्यों का चुनाव किया। सितंबर २००१ में प्रजातंत्रीकरण की ओर एक बड़ा कदम उठाया गया, जब निर्वाचकों ने मंत्रिमंडल के सबसे वरिष्ठ कलोन ठिपा का सीधा चुनाव किया। इसके बाद कलोन ठिपा ने अपने मंत्रिमंडल की नियुक्ति की जिनके लिए तिब्बती संसद की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है। तिब्बत के लंबे इतिहास में, यह पहला अवसर था जब लोगों ने तिब्बत के राजनैतिक नेतृत्व को पहली बार चुना।

शांति पहल

तिब्बत की बिगड़ती परिस्थिति के शांति समाधान के लिए एक पहले कदम के रूप में सितंबर १९८७  में परम पावन ने  पाँच बिंदु शांति प्रस्ताव रखा। उन्होंने कल्पना की कि तिब्बत एक आश्रय स्थल बनेगा; एशिया के केन्द्र में शांति का क्षेत्र, जहाँ सभी सत्त्व समन्वय की भावना के साथ रह सकेंगे और उस कोमल वातावरण को सुरक्षित रखा जा सकेगा। परम पावन द्वारा प्रस्तावित इन विभिन्न शांति प्रस्तावों पर एक सकारात्मक उत्तर देने में चीन अब तक असफल रहा है।

पाँच बिंदु शांति योजना

२१ सितम्बर १९८७ को वाशिंगटन डी सी में संयुक्त राज्य अमरीका के कांग्रेस को संबोधित करते हुए परम पावन ने निम्नलिखित शांति प्रस्ताव रखा:

1    सम्पूर्ण तिब्बत को एक शांति क्षेत्र में परिवर्तित किया जाए।

2    चीन की जनसंख्या स्थानातंरण की नीति जो तिब्बतियों के अस्तित्व के लिए ही एक खतरा है, को पूरी तरह से छोड़ दिया जाए।

3    तिब्बतियों के आधारभूत मानवीय अधिकार और प्रजातंत्रीय स्वतंत्रता के प्रति सम्मान की भावना।

4    तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण की पुनर्स्थापना और संरक्षण तथा चीन द्वारा आणविक शस्त्रों के निर्माण और परमाणु कूड़ादान के रूप में तिब्बत को काम में लाए जाने को छोड़ना ।

5    तिब्बत के भविष्य की स्थिति और तिब्बतियों तथा चीनियों के आपसी संबंधों के विषय में गंभीर बातचीत की शुरुआत।

स्ट्रासबर्ग प्रस्ताव

१५ जून,१९८८  को यूरोपियन संसद में परम पावन ने पाँच बिंदु शांति योजना के अंतिम बिंदु का विस्तार करते हुए एक और विस्तृत प्रस्ताव रखा। उन्होंने तिब्बत के तीनों प्रांतों में स्वशासित प्रजातंत्रीय राजनैतिक सत्ता के लिए चीनी और तिब्बतियों के बीच बातचीत का रास्ता सुझाया। यह सत्ता चीनी संघ के साथ होगी तथा चीन सरकार तिब्बत की विदेश नीति तथा सुरक्षा के लिए उत्तरदायी रहेगी।

सार्वभौमिक पहचान

परम पावन दलाई लामा शांति प्रिय व्यक्ति हैं। १९८९  में तिब्बत को स्वतंत्र कराने में उनके अहिंसात्मक संघर्ष के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अत्यधिक आक्रात्मक स्थितियो में भी वे निरंतर अहिंसात्मक नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। वे पहले नोबेल विजेता हुए हैं जिन्होंने वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं के प्रति अपनी चिंता जताई।

परम पावन ६ महाद्वीपों के ६२ से भी अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। वे बड़े देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और राजकीय शासकों से मिले हैं। वे विभिन्न धर्मों के प्रमुखों और जाने माने वैज्ञानिकों से भी संवाद कर चुके हैं।

उनके शांति, अहिंसा, अंतर्धर्मीय समझ, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व तथा करुणा के संदेश को देखते हुए १९५९ से परम पावन जी को ८४ से भी अधिक सम्मान, सम्माननीय डॉक्टरेट, पुरस्कार इत्यादि मिल चुके हैं। परम पावन ने ७२ से भी अधिक पुस्तकें लिखी है।  

परम पावन स्वयं को एक साधारण बौद्ध भिक्षु कहकर संबोधित करते हैं।

 

खोजें