प्रश्न और उत्तर

प्रश्न: आप स्वयं को किस रूप में देखते हैं  ?

उत्तर: मैं सदा अपने आप को एक साधारण बौद्ध भिक्षु के रूप में देखता हूँ। मुझे लगता है कि वही मेरा वास्तविक रूप है। मुझे लगता है कि दलाई लामा का एक लौकिक शासक का रूप एक मानव निर्मित संस्था है। जब तक लोग दलाई लामा को स्वीकार करते हैं, वे मुझे स्वीकार करेंगे। पर एक भिक्षु होना कुछ ऐसा है, जो मेरा अपना है। कोई इसे परिवर्तित नहीं कर सकता। अपने अंतरतम में, मैं हमेशा अपने आप को एक भिक्षु मानता हूँ, यहाँ तक कि स्वप्न में भी। अतः स्वाभाविक रूप से मैं अपने आप को एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में अधिक अनुभव करता हूँ। यहाँ तक ​​कि अपने दैनिक जीवन में भी, मैं कह सकता हूँ कि मैं अपने समय का ८०% भाग आध्यात्मिक गतिविधियों तथा २०% तिब्बत पर लगाता हूँ। आध्यात्मिक या धार्मिक जीवन के बारे में, मैं जानता हूँ और मेरी इस में बहुत रुचि है। मेरा इसमें एक प्रकार का विश्वास है और इसलिए मैं इसका और अधिक अध्ययन करना चाहता हूँ। जहाँ तक राजनीति का संबंध है मेरे पास अल्प अनुभव के अतिरिक्त कोई आधुनिक शिक्षा नहीं है। किसी ऐसे के िलए जो पूरी तरह लैस नहीं है यह एक बड़ा उत्तरदायित्व है। यह स्वैच्छिक कार्य नहीं है पर ऐसा कुछ है जो मुझे लगता है कि मुझे करना चाहिए, क्योंकि तिब्बती लोगों ने मुझ पर आशा और विश्वास रखा है।

प्रश्न: क्या आप अंतिम दलाई लामा होंगे?

उत्तर: दलाई लामा संस्था बनी रहे अथवा नहीं यह पूर्ण रूप से तिब्बती लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है। यह निर्णय उन्हें लेना है। यह मैंने १९६९ में ही स्पष्ट कर दिया था। यहाँ तक ​​कि १९६३ में ही, निर्वासन में चार वर्षों के बाद, हमने लोकतांत्रिक प्रणाली पर आधारित आगामी तिब्बत के लिए संविधान का एक मसौदा बनाया था। संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि दलाई लामा की सत्ता सदन के सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से हटायी जा सकता है। सम्प्रति, दलाई लामा संस्था तिब्बती संस्कृति और तिब्बती लोगों दोनों के लिए उपयोगी है। यदि मेरी मृत्यु आज हो गई तो तिब्बती लोग एक और दलाई लामा चुनना चाहेंगे। भविष्य में यदि दलाई लामा संस्था, प्रासंगिक या उपयोगी न हो और हमारी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन हो जाए तो दलाई लामा संस्था समाप्त हो जाएगी। वैयक्तिक तौर पर मुझे लगता है कि दलाई लामा संस्था का उद्देश्य पूरा हो चुका है अभी हाल ही में २००१ के बाद से हमारे प्रशासन के लोकतांत्रिक ढंग से चुने नए प्रमुख, कलोन ठिपा हैं। कलोन ठिपा हमारे प्रशासन के दैनिक मामलों को चलाते हैं और हमारे राजनैतिक प्रतिष्ठान के प्रभारी हैं। आधी हँसी और आधी गंभीरता से मैं कहता हूँ, कि अब मैं अर्द्ध सेवानिवृत्त हूँ।
 
प्रश्न: क्या आप को लगता है कि आप कभी तिब्बत लौटने में सक्षम हो पाएँगे ?

उत्तर: हाँ, मैं इस बात को लेकर आशावादी बना रहता हूँ कि मैं तिब्बत लौटने में सक्षम हूँगा। चीन बदलने की प्रक्रिया में है। यदि आप आज के चीन की तुलना दस या बीस वर्ष के पहले से करें तो अत्यधिक परिवर्तन आया है। चीन अब एकाकी नहीं है। यह विश्व समुदाय का भाग है। वैश्विक अन्योन्याश्रितता विशेष रूप से अार्थिक और पर्यावरण के संदर्भ में राष्ट्रों के लिए पृथक बना रहना असंभव है। इसके अतिरिक्त मैं चीन से अलग होने की माँग नहीं कर रहा। मैं अपने मध्यम मार्ग दृष्टिकोण को लेकर प्रतिबद्ध हूँ, जिसके अनुसार तिब्बत चीन की पीपुल्स रिपब्लिक के भीतर रहते हुए एक उच्च स्तरीय स्व शासन अथवा स्वायत्तता का आनंद उठा सकता है। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यह तिब्बतियों तथा चीनियों दोनों ही के लिए पारस्परिक रूप से हितकारी है। हम तिब्बती चीन की सहायता से तिब्बत का विकास कर सकते हैं और साथ साथ अपनी अनूठी संस्कृति, जिसमें आध्यात्मिकता सम्मिलित है, और हमारे नाजुक पर्यावरण का संरक्षण कर सकते हैं। तिब्बती समस्या का समाधान सौहार्दपूर्ण ढंग से निकाल कर चीन अपनी स्वयं की एकता और स्थिरता में योगदान करने में सक्षम हो सकेगा।

प्रश्न: चीन ने हाल ही कहा है कि अगले दलाई लामा का जन्म तिब्बत में होगा और वे उनके द्वारा चुना जाएँगे। आपका इस बारे में क्या कहना है?


उत्तर: यदि तिब्बत को लेकर वर्तमान स्थिति ऐसी ही बनी रहती है, तो मैं तिब्बत के बाहर चीनी अधिकारियों के नियंत्रण से दूर जन्म लूँगा। यह तर्क संगत है। पुनर्जन्म का उद्देश्य ही पिछले अवतार के अधूरे कार्य को पूरा करने हेतु है। तो यदि तिब्बती स्थिति अभी भी अनसुलझी बनी रहे तो यह न्यायसंगत है कि मैं अपने अधूरे काम को जारी रखने के लिए निर्वासन में जन्म लूँगा। निस्संदेह चीनी तब भी अपने स्वयं के दलाई लामा का चयन करेंगे और हम तिब्बती परंपरा के अनुसार हमारा अपना चयन करेंगे। यह पंचेन लामा की वर्तमान स्थिति के समान हो जाएगा। एक चीनी नियुक्त पंचेन लामा है और एक मेरे द्वारा चुना पंचेन लामा है। एक अपने मालिक के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सामने लाया जाता है और एक अन्य सभी तिब्बतियों के हृदयों द्वारा स्वीकृत पंचेन लामा है।
 
प्रश्न: आपकी क्या प्रतिबद्धताएँ हैं ?


उत्तर: साधारणतया मैं हमेशा कहता हूँ कि जीवन में मेरी तीन प्रतिबद्धताएँ हैं। सबसे प्रथम एक मानवीय स्तर पर, मेरी पहली प्रतिबद्धता करुणा, क्षमा, सहिष्णुता, आत्म - संतोष और आत्मानुशासन के रूप में मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना है। सभी मनुष्य समान हैं। हम सभी सुख चाहते हैं और दुख नहीं चाहते। यहाँ तक कि वे लोग भी जो धर्म में विश्वास नहीं करते, वे अपने जीवन को और अधिक सुखी बनाने में इन मानवीय मूल्यों के महत्त्व को समझते हैं। मैं इन मानवीय मूल्यों के महत्त्व के बारे में बात करने हर मिलने वाले के साथ साझा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। दूसरे, एक धार्मिक अभ्यासी के स्तर पर, मेरी दूसरी प्रतिबद्धता विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच धार्मिक सौहार्दता और समझ को बढ़ावा देने की है। दार्शनिक मतभेदंों के बाद भी विश्व की सभी प्रमुख धार्मिक परंपराओं में बेहतर मानव निर्मित करने की समान क्षमता है। इसलिए सभी धार्मिक परंपराओं के लिए यह आवश्यक है कि वे एक दूसरे का सम्मान करें और एक दूसरे की संबंधित परंपराओं के मूल्य को पहचानें। तीसरा, मैं एक तिब्बती हूँ और दलाई लामा का नाम धारण करता हूँ। तिब्बतियों ने अपना विश्वास मुझ पर रखा है। इसलिए, मेरी तीसरी प्रतिबद्धता तिब्बती प्रश्न है। न्याय के लिए उनके संघर्ष में तिब्बतियों के एक स्वतंत्र प्रवक्ता होने का मेरा अपना एक उत्तरदायित्व है। जहाँ तक ​​इस तीसरी प्रतिबद्धता का प्रश्न है तिब्बतियों और चीनियों के बीच एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद समाधान मिलते ही यह समाप्त हो जाएगा। परन्तु मेरी पहली दो प्रतिबद्धताओं को मैं अपनी आखिरी साँस तक बनाए रखूँगा।
 
प्रश्न: दलाई लामा के रूप में पहचाने जाने पर आपकी पहली भावनाएँ क्या थी? आप को क्या लगा कि आपको क्या हुआ था ?


उत्तर: मैं बहुत खुश था। मुझे यह बहुत अच्छा लगा। मेरी पहचान होने से पहले भी मैं प्रायः अपनी माँ से कहा करता था कि मैं ल्हासा जा रहा हूँ। मैं अपने घर की एक खिड़की के दासे पर सवारी करता और इस प्रकार का नाटक करता मानों घोड़े पर बैठकर ल्हासा जा रहा हूँ। उस समय मैं एक बहुत छोटा सा बच्चा था, पर यह मुझे स्पष्ट रूप से याद है। मेरी वहाँ जाने की प्रबल ईच्छा थी। मैंने अपनी आत्मकथा में यह जिक्र नहीं किया था कि मेरे जन्म के बाद, कौवों का एक जोड़ा हमारे घर की छत पर बसेरा करने के लिए आया। वे प्रत्येक दिन प्रातः वेला में पहुँचते, थोड़ी देर रहते और फिर चले जाते। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि इसी प्रकार की घटनाएँ प्रथम, सातवें, आठवें और बारहवें दलाई लामा के जन्म के समय में हुई। उनके जन्मों के बाद, कौवे का एक जोड़ा आया और बना रहा। मेरे ही समय में प्रारंभ में किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। परन्तु हाल ही में संभवतः तीन वर्ष पूर्व मैं अपनी माँ के साथ बात कर रहा था, और उन्होंने इसका स्मरण किया। उन्होंने उन्हें प्रातः आते देखा था, कुछ समय पश्चात वे चले जाते और दूसरे दिन प्रातः पुनः आ जाते। प्रथम दलाई लामा के जन्म के बाद डाकू घर में घुस आए थे। बच्चे को छोड़ माता - पिता भाग गए। अगले दिन जब वे यह सोचते हुए लौटे कि उनके बच्चे का क्या हुआ होगा उन्हें घर के एक कोने में बच्चा मिला। एक कौवा उसके समक्ष खड़ा उसकी रक्षा कर रहा था। बाद में जब प्रथम दलाई लामा बड़े हुए और अपनी आध्यात्मिक साधना में विकसित हुए तो उन्होंने ध्यान के दौरान सुरक्षा प्रदान करने वाले देवता, महाकाल के साथ सीधा संपर्क साधा। उस समय, महाकाल ने उनसे कहा तुम जैसे को जो बौद्ध शिक्षाओं को कायम कर रहा है, उसे मुझ जैसे एक रक्षक की आवश्यकता है। ठीक तुम्हारे जन्म के दिन मैंने तुम्हारी सहायता की। इस तरह हम देख सकते हैं कि महाकाल, कौवों, और दलाई लामा के बीच निश्चित रूप से एक संबंध है।
 
एक और बात जो मेरी माँ बहुत स्पष्ट रूप से याद करती है, कि मेरे ल्हासा में पहुँचने के तुरंत बाद, मैंने कहा कि मेरे दाँत, एक बक्से में नोर्बुलिंगा में एक निश्चित घर में हैं। जब उन्होंने बक्सा खोला तो उन्हें डेन्चर (नकली दाँतों) का एक सेट मिला जो तेरहवें दलाई लामा का था। मैंने बक्से की ओर संकेत किया और कहा कि मेरे दाँत वहाँ थे, पर अब मुझे यह तनिक भी स्मरण नहीं है। इस शरीर के साथ जुड़ी नई स्मृतियाँ अधिक प्रबल हैं। अतीत छोटा और अस्पष्ट बन गया है। जब तक कि मैं इस तरह एक स्मृति को विकसित करने का एक विशिष्ट प्रयास न करूँ मुझे स्मरण नहीं पड़ता।
 
प्रश्न: क्या आपको अपने जन्म या उसके पूर्व गर्भ की स्थिति का स्मरण है ?


उत्तर: इस क्षण मुझे स्मरण नहीं। साथ ही मुझे यह भी स्मरण नहीं कि जब मैं एक छोटा बच्चा था तब क्या मुझे स्मरण था। परन्तु संभवतः एक छोटा सा बाह्य संकेत था। साधारणतया जन्म के समय बच्चों की आँखें बंद होती है। मेरी आँखें खुली थी। यह गर्भ में चित्त की स्पष्ट स्थिति का एक हल्का संकेत हो सकता है।
 
प्रश्न: सोलह और अठारह वर्ष की आयु के बीच लौकिक सत्ता ग्रहण के बाद क्या आप में परिवर्तन हुआ?

उत्तर: हां, मुझमें किंचित परिवर्तन आया। मुझे कई सुख और पीड़ा झेलनी पड़ी। उस में रहते हुए और बड़े होते हुए, अधिक अनुभव प्राप्त करते हुए, जो समस्याएँ उत्पन्न हुई और दुख से मुझ में बदलाव आया। परिणामस्वरूप जो व्यक्ति समक्ष है उसे आप देख रहे हैं। (हँसी)
 
प्रश्न: किशोरावस्था में प्रवेश करने पर क्या हुआ? कइयों के िलए स्वयं को एक वयस्क के रूप में परिभाषित करना कठिन होता है। क्या ऐसा आपके साथ हुआ?


उत्तर: नहीं, मेरा जीवन दिनचर्या में बहुत अधिक बँधा था। एक दिन में दो बार मैं अध्ययन करता। हर बार मैं एक घंटे के लिए अध्ययन करता और उसके बाद का समय खेल- कूद में बिताता। (हँसी) फिर १३ वर्ष की आयु में मैंने दर्शन, परिभाषाओं, शास्त्रार्थ का अध्ययन प्रारंभ किया। मेरे अध्ययन में वृद्धि हुई और मैंने सुलेख का भी अध्ययन किया। यद्यपि यह सब दिनचर्या में था, और मैं इसे करने में अभ्यस्त हो गया। कभी कभी अवकाश होता। ये बहुत ही आरामदायक और सुखपूर्ण थे। लोबसंग समतेन, मेरे बड़े भाई आमतौर पर स्कूल में होते, पर इस दौरान वे मिलने आते। साथ ही मेरी माँ भी कभी कभी आती और अमदो के हमारे प्रांत से विशेष रोटी लाती, बहुत मोटी और स्वादिष्ट। वे स्वयं उन्हें पकातीं थी।
 
प्रश्न: आपके पूर्ववर्तियों में से किसी एक में क्या आपकी विशेष रुचि है या जिनके साथ आप एक विशेष आत्मीयता का अनुभव करते हैं ?

उत्तर:
तेरहवें दलाई लामा। उन्होंने विहार के महाविद्यालयों में अध्ययन के स्तरों में बहुत सुधार किया। सच्चे विद्वानों को उन्होंने बहुत प्रोत्साहन दिया। उन्होंने लोगों का पूरी तरह से योग्य हुए बिना धार्मिक पदानुक्रम में आगे बढ़ने के लिए, जैसे विहाराधीश बनने इत्यादि की प्रक्रिया लगभग असंभव कर दी थी। इस संबंध में वे बहुत सख्त थे। उन्होंने हज़ारों भिक्षुओं का अभिषेक भी करवाया। ये उनकी दो मुख्य धार्मिक उपलब्धियाँ थी। उन्होंने बहुत दीक्षा या व्याख्यान नहीं दिए। अब जहाँ तक देश का संबंध था तो शासन कला को लेकर उनमें महान विचार और सम्मान था। विशेष रूप से दूरस्थ प्रांतों के संबंध में। उन्हें किस प्रकार शासित किया जाना चाहिए इत्यादि। उन्हें इस बात की बहुत परवाह थी कि किस प्रकार सरकार को और अधिक कुशलता से चलाया जाए। उन्हें हमारी सीमाओं और इस प्रकार के बातों को लेकर बहुत चिंता थी।

प्रश्न: अपने जीवन के दौरान आपकी सबसे बड़ी व्यक्तिगत शिक्षा या आंतरिक चुनौतियों क्या रही है? कौन सी अनुभूतियों और अनुभवों का एक व्यक्ति के रूप में आपके विकास पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है?


उत्तर:
जहाँ तक धार्मिक अनुभव का संबंध है, लगता है शून्य की कुछ समझ (शून्य: आत्मा के स्वतंत्र प्रकृति का अभाव) आई है, कुछ अनुभव और अधिकतर बोधिचित्त, परोपकार। इसने बहुत सहायता की है। कुछ अर्थों में, आप कह सकते हैं कि इसने मुझे एक नया व्यक्ति बनाया है, एक नया व्यक्ति। मैं अभी भी आगे बढ़ रहा हूँ। प्रयास कर रहा हूँ। यह आपको आंतरिक शक्ति, साहस देता है, और इस प्रकार परिस्थितियों को स्वीकार करना सरल है। यही सबसे बड़े अनुभवों में से एक है।
 
प्रश्न: जब आप शरणार्थी बने तो इस शक्ति को पाने में किस वस्तु से सहायता मिली? क्या यह आपके पद और देश की क्षति थी, कि आपके चारों ओर लोग पीड़ित थे। क्या आप से जिस रूप में आप आदी थे उससे अलग ढंग से अपने लोगों का नेतृत्व करने के िलए कहा गया ?

उत्तर: एक शरणार्थी होना वास्तव में एक हताश, संकटपूर्ण स्थिति है। उस समय हर कोई वास्तविकता से जूझता है। यह दिखावे का समय नहीं है कि सब कुछ सुंदर है। वह एक बात है। आप वास्तविकता के साथ शामिल लगते हैं। शांति काल में सब कुछ सहजता से होता चला जाता है। अगर कोई समस्या हो तो भी लोग दिखावा करते हैं कि सब अच्छा है। एक संकटपूर्ण अवधि के दौरान जब एक नाटकीय परिवर्तन होता है तो फिर दिखावा करने की, कि सब ठीक है, कोई गुंजाइश नहीं रहती। आप को स्वीकार करना चाहिए कि बुरा बुरा है। जब मैंने नोर्बुलिंगा छोड़ा तो संकट था। हम चीनी सैन्य बैरकों के बहुत निकट होकर जा रहे थे। चीनी जाँच पोस्ट सिर्फ नदी के दूसरी ओर था। आप देखें कि हमारे पास मेरे निकलने के दो या तीन सप्ताह पहले निश्चित जानकारी थी कि चीनी हम पर आक्रमण करने के िलए पूरी तरह से तैयार थे। यह मात्र दिन और घंटे का प्रश्न था।
 
प्रश्न: आपको अनंत करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर का अवतार स्वरूप माना जाता है। व्यक्तिगत रूप से आप इस बारे में कैसा अनुभव करते हैं? क्या इस विषय में आप इस अथवा उस पक्ष पर सुस्पष्ट िवचार रखते हैं ?

उत्तर: मेरे िलए निश्चित रूप से यह कहना कठिन है। जब तक कि मैं ध्यान प्रयास में न लगूँ, इस तरह कि एक एक साँस अपने जीवन के पूर्व भाग में लौटूँ नहीं, मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता। हमारा मानना है कि पुनर्जन्म के चार प्रकार होते हैं। एक तो साधारण प्रकार जिसमें सत्व अपने पुनर्जन्म का निर्धारण करने में असमर्थ होता/होती है, वह मात्र अपने पूर्व कर्मों की प्रकृति पर निर्भर होकर पुनर्जन्म लेता है। इसके विपरीत पूर्ण रूप से प्रबुद्ध बुद्ध हैं, जो मात्र दूसरों की सहायता के िलए भौतिक रूप से प्रकट होते हैं। इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि यह व्यक्ति बुद्ध है। एक तीसरा रूप यह है कि पिछली आध्यात्मिक उपलब्धि के कारण वह अपने पुनर्जन्म का स्थान अथवा परिस्थिति चुन सकता है या कम से कम उसे प्रभावित कर सकता है। चौथे को एक धन्य प्रकटीकरण कहते हैं। इस में व्यक्ति सहायता करने की जैसे धर्म की शिक्षा देना की अपनी साधारण क्षमता से परे धन्य होता है। जन्म के इस अंतिम प्रकार के लिए अपने पूर्व जन्मों में व्यक्ति में परोपकार की इच्छाएँ बहुत प्रबल रही होगी। वे इस प्रकार के अभिषेक प्राप्त करते हैं। यद्यपि कुछ दूसरों की तुलना में अधिक संभावित लग रहे हैं, पर मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि मैं कौन सा हूँ।
 
प्रश्न (इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए): चेनेरेजिग की जो यथार्थवादी भूमिका आप निभा रहे हैं उस दृष्टिकोण से आपको इस विषय में कैसा लगता है? केवल कुछ ही लोगों को किसी न किसी रूप दैविक माना गया है। यह भूमिका एक बोझ या एक आनंद है?


उत्तर: यह बहुत सहायक है। इस भूमिका के माध्यम से मैं लोगों को काफी लाभ पहुँचा सकता हूँ। अतः मुझे यह प्रिय है: मैं इसके साथ अपनत्व अनुभव करता हूँ। यह स्पष्ट है कि यह लोगों के लिए बहुत उपयोगी है, और इस भूमिका में होने के लिए मेरे कर्म संबंध हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि विशेष रूप से तिब्बती लोगों के साथ एक कर्म संबंध है। अब आप देखें, कि आप सोच सकते हैं कि इन परिस्थितियों में, मैं बहुत भाग्यवान हूँ। यद्यपि भाग्य शब्द के पीछे वास्तविक हेतु तथा कारण हैं। इस भूमिका को स्वीकार करने में मेरी क्षमता का कर्म बल है और साथ ही मेरी इच्छा का भी बल है। इस संबंध में महान शांतिदेव के बोधिसत्त्वचर्यावतार में एक कथन है जिसके अनुसार जब तक अंतरिक्ष का अस्तित्व है, जब तक भव चक्र में प्राणी भटक रहे हैं, मैं भी उनके कष्टों के निवारण हेतु बना रहूँ। इस जीवन काल में मेरी यह कामना है और मैं जानता हूँ कि पूर्व जन्मों में मेरी यह कामना थी।
 
प्रश्न ः(इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए): ऐसे व्यापक उद्देश्य के रूप में अपनी प्रेरणा को आप अपनी व्यक्तिगत सीमाओं, एक मनुष्य की सीमाओं के साथ कैसे सँभालते हैं ?

उत्तर: पुनः जैसे शांतिदेव कहते हैं, यदि भगवान बुद्ध सभी सत्त्वों को खुश नहीं कर सकते, तो मैं कैसे कर सकता हूँ। यहाँ तक ​​कि असीम ज्ञान तथा शक्ति और दुखों से अन्य सभी को बचाने की कामना लिए एक प्रबुद्ध सत्त्व भी व्यक्ति के निजी कर्म को समाप्त नहीं कर सकते।

प्रश्न (इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए): क्या यही आपको अभिभूत होने से बचाती है, जब आप साठ लाख तिब्बतियों का दुख देखते हैं जो एक स्तर पर आप का उत्तरदायित्व हैं?

उत्तर: मेरी प्रेरणा सभी सत्त्वों के प्रति निर्देशित है। इस संबंध में कोई प्रश्न नहीं उठता कि दूसरे स्तर पर, मैं तिब्बतियों की सहायता करने की दिशा में निर्देशित हूँ। यदि कोई समस्या लचीली है, यदि परिस्थिति ऐसी है कि आप इस विषय में कुछ कर सकते हैं तो चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि यह लचीली नहीं है, तो चिंता करने का कोई लाभ नहीं। किसी भी स्थिति में चिंता से कोई लाभ नहीं है।
 
प्रश्न (इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए): बहुत सारे लोग ऐसा कहते हैं पर केवल थोड़े ही उसे जीते हैं। क्या आप सदा इस प्रकार से अनुभव करते थे, या आप को यह सीखना पड़ा?


उत्तर: यह आंतरिक अभ्यास से विकसित है। एक व्यापक परिप्रेक्ष्य से दुख सदा रहेगा। एक स्तर पर, आपको पूर्व में काय, वाक तथा चित्त द्वारा अपने स्वयं के अकुशल कार्यों के प्रभावों का सामना करना ही पड़ेगा। फिर आपकी अपनी प्रकृति दुख की है। दुख उत्पाद की वास्तविक इकाई की दृष्टि से जैसा मैंने कहा कि यदि यह लचीली है तो चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। और यदि नहीं तो चिंता करने का कोई लाभ नहीं है। कारण की दृष्टि से देखने पर, दुख का आधार स्व संचित पूर्व अकुशल कार्य हैं और कुछ नहीं। ये कर्म व्यर्थ नहीं होते। उनका विपाकीकरण होगा। वो कर्म जो व्यक्ति ने स्वयं नहीं िकए, उसका प्रभाव व्यक्ति को नहीं झेलना पड़ेगा। अंत में दुख की प्रकृति के विषय में ही चित्त तथा काय के स्कंध की उनकी वास्तविक प्रकृति दुख है। वे दुख का आधार बनते हैं। जब तक वे आपमें हैं आप दुख से प्रभावित होते हैं। एक गहन दृष्टिकोण से जहाँ हम स्वतंत्र नहीं हैं और िकसी अन्य के देश में रह रहे हैं, हमें एक प्रकार का दुख है, पर जब हम तिब्बत लौटेंगे और अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे तो अन्य प्रकार के दुख होेंगे। इसलिए यह इसी प्रकार है। आप सोच सकते हैं कि मैं निराशावादी हूँ, पर मैं नहीं हूँ। हम इसी प्रकार बौद्ध शिक्षा और सलाह से परिस्थितियों को सँभालते हैं। जब शाक्य जाति के पचास हज़ार लोग एक दिन में मारे गए तो उनकी ही जाति के शाक्यमुनि बुद्ध दुखी नहीं हुए। वह एक पेड़ से टिककर बैठे थे और कह रहे थे, मैं उदास हूँ कि मेरी जाति के पचास हज़ार लोग मारे गए। पर वे स्वयं उससे अप्रभावित रहे। उस तरह। (हँसी) ये उनके कमों के कारण फल थे। वे इस संबंध में कुछ नहीं कर सकते थे। इस प्रकार के विचार मुझे और सशक्त करते हैं, और सक्रिय करते हैं। यह दुख की व्यापक प्रकृति को समक्ष देखकर चित्त की शक्ति या इच्छा खोना बिलकुल नहीं है ।

 

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