पुनर्जन्म ( मूल तिब्बती से अनूदित )

परिचय

तिब्बत में और तिब्बत के बाहर मेरे साथी तिब्बतियों, वे सभी जो तिब्बती बौद्ध परम्परा का पालन करते हैं, और वे सब जिनका तिब्बत और तिब्बतियों से कोई संबंध है ः हमारे प्राचीन राजाओं, मंत्रियों, पण्डितों और सिद्धों की दूरदृष्टिता के कारण बुद्ध की आगम तथा अधिगम के समस्त शासन, जिनमें तीन यानों के ग्रंथीय तथा अनुभवात्मक शिक्षाएँ तथा तंत्र के चार रूप और उनसे संबंधित विषय तथा अनुशासन शामिल हैं, हिम प्रदेश में व्यापक रूप से फली फूलीं। तिब्बत विश्व भर के लिए बौद्ध तथा संबंधित सांस्कृतिक परंपराओं का स्रोत रहा है। विशेष रूप से इसने एशिया में अनगिनत प्राणियों, जिनमें चीन, तिब्बत और मंगोलिया शामिल हैं, के सुख के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

तिब्बत में बौद्ध परंपरा को बनाए रखने के दौरान, अनेक विद्वान-अभ्यासी महापुरुषों के पुनर्जन्म की पहचान करने का हमने एक अनूठी तिब्बती परंपरा का विकास किया, जिसका अत्यंत लाभ धर्म और सत्वों को विशेष रूप से विहार समुदाय को हुआ।

जब से सर्वज्ञ गेदुन ज्ञाछो की पहचान हुई और पन्द्रहवीं शताब्दी में उन्हें गेदुन डुब का अवतार माना गया तथा गदेन फोडंग लबरंग (दलाई लामा संस्था) स्थापित हई, तब से उनके बाद के अवतारों को मान्यता प्राप्त हुई। इस क्रम में तृतीय सोनम ज्ञाछो को दलाई लामा का नाम दिया गया। पाँचवें दलाई लामा नवांग लोबसंग ज्ञाछो ने १६४२ में तिब्बत के आध्यात्मिक तथा राजनीतिक प्रमुख बनते हुए गदेन फोडंग शासन की स्थापना की। गेदुन ़़डुब के समय से ६०० वर्षों से अधिक समय में दलाई लामा की श्रृखंला में बिना किसी त्रुटि के क्रमिक रूप से पुनर्जन्मों की पहचान हुई है।

१६४२ से दलाई लामा ने विगत ३६९ वर्षों से तिब्बत के राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता दोनों के रूप में कार्य किया है। मैंने अब स्वेच्छा से इसका अंत किया है, गर्व तथा संतोष का अनुभव करते हुए कि हम उस प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली शासन का पालन कर सकते हैं जो विश्व में कहीं और फल फूल रही है। यहाँ तक कि १९६९ से ही मैंने स्पष्ट कर दिया था कि इस से जुड़े लोग यह निश्चय करें कि क्या भविष्य में दलाई लामा के अवतारों को चलते रहना चाहिए। परन्तु स्पष्ट दिशा निर्देश के अभाव में यदि सम्बद्धित जनता दलाई लामा की निरंतरता को लेकर एक प्रबल इच्छा स्पष्ट करे, तो राजनैतिक हितों को पूरा करने के िलए पुनर्जन्म प्रणाली का दुरुपयोग निहित राजनीतिक हितों द्वारा एक स्पष्ट खतरा है। इसलिए जब तक मैं शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हूँ यह मुझे महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है कि हम अगले दलाई लामा की पहचान के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश तैयार कर लें ताकि फिर संदेह या छल के लिए कोई स्थान न हो। इन दिशा निर्देशों को पूर्ण रूप से बोधगम्य करने के लिए टुल्कु पहचान की प्रणाली और उसके पीछे की मूल अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। इसलिए, मैं संक्षेप में नीचे उन्हें समझाऊँगा।

पूर्व और पर जन्म

पुनर्जन्म या टुल्कुओं की वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए हमें पूर्व और आगामी जीवन के अस्तित्व को स्वीकार करने की आवश्यकता है। सत्व अपने पूर्व जीवन से इस वर्तमान जीवन में आते हैं और मृत्यु के पश्चात फिर से पुनर्जन्म लेते हैं। इस प्रकार का निरंतर पुनर्जन्म सभी प्राचीन भारतीय परम्पराओं और सभी वादों में स्वीकार किया जाता है केवल चारवाक को छोड़कर जो भौतिकवादी आंदोलन के पक्षधर थे। कुछ आधुनिक चिंतक पूर्व और भविष्य जीवन इस आधार पर नकारते हैं कि हम उन्हें देख नहीं सकते। अन्य, इस आधार पर इस तरह के स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकालते।
 
यद्यपि कई धार्मिक परम्पराएँ पुनर्जन्म स्वीकार करती है, वे अपने इस मत में अंतर रखती है कि वह क्या है जिसका पुनर्जन्म होता है, उसका पुनर्जन्म कैसे होता है, और कैसे वह दो जीवन के बीच संक्रमणकालीन अवधि से होकर जाता है। कुछ धार्मिक परम्पराएँ भविष्य के जीवन की संभावना को स्वीकार करती है, पर पूर्व जन्मों के विचार को त्यागती है।

आम तौर पर, बौद्धों की यह मान्यता है कि जन्म का कोई प्रारंभ नहीं है और एक बार हम अपने कर्मों तथा क्लेशों पर काबू पाकर भव चक्र से मुक्ति पा लें तो हम इन परिस्थितियों के प्रभाव में पुनर्जन्म नहीं लेंगे। इसलिए बौद्ध मानते हैं कि कर्म और क्लेशों के परिणामस्वरूप पुनर्जन्म का अंत है, पर अधिकांश बौद्ध परम्पराएँ यह नहीं मानती कि चित्त के संतति का अंत होता है। पूर्व और आगामी पुनर्जन्म को अस्वीकार करना बौद्ध धारणा के स्थान, मार्ग तथा फल का विरोध करना है जिसको अनुशासित अथवा अनुशासनहीन चित्त के आधार पर समझाया जा सकता है। यदि हम इस तर्क को स्वीकार करते हैं, तो तार्किक रूप से हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि यह विश्व और उसके निवासी कारणंों और परिस्थितियों के िबना अस्तित्व में आते हैं। इसलिए,जब तक आप बौद्ध हैं पूर्व और आगामी पुनर्जन्म को स्वीकार करना आवश्यक है।

उन लोगों के लिए जिनको अपने पूर्व जन्मों की याद है, पुनर्जन्म परोक्ष नहीं है। परन्तु अधिकांश साधारण लोग मृत्यु, अंतरभव की अवस्था तथा पुनर्जन्म की प्रक्रिया से निकलते हुए अपने पूर्व जन्मों को भूल जाते हैं। चूँकि पूर्व और आगामी पुनर्जन्म उनके लिए किंचित परोक्ष होता है, हमें उनके िलए पूर्व और आगामी पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए प्रमाण आधारित तर्क की आवश्यकता होती है।

पूर्व और आगामी जीवन के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए बुद्ध वचन और उसके भाष्यों में कई अलग अलग तार्किक बहस दिए गए हैं। संक्षेप में, वे चार िबंदुओं में रखे जा सकते हैं: सजातीय पूर्वगामी, उपादान पूर्वगामी, अभ्यास पूर्वगामी और अनुभव पूर्वगामी।

अंततः यह सभी तर्क इस विचार पर आधारित हैं कि स्फुट विद्या का यह चित्त अपनी उपादान में स्फुट विद्या न हो तो जड वस्तु स्फुट विद्या का उपादान नहीं हो सकता। यह स्वतः स्पष्ट है। तार्किक विश्लेषण के माध्यम से अथवा रसायनिक प्रयोग से स्फुट विद्या की नई संतति अकारण या विसदृश हेतु से सिद्ध नहीं की जा सकती और अनुमान लगा सकते हैं कि सूक्ष्म स्फुट विद्या उच्छेद का हेतु प्रत्यय भी नहीं है।

जहाँ तक मुझे ज्ञात है, कोई आधुनिक मनोवैज्ञानिक, भौतिक विज्ञानी या तंत्रिका वैज्ञानिक अकारण अथवा जड पदार्थ से  स्फुट विद्या उत्पाद की स्थिति न प्रत्यक्ष दिखा पाया है और न ही अनुमान लगा पाया है।

ऐसे लोग हैं जो उनके तत्काल पूर्व जीवन, यहाँ तक ​​कि कई पिछले जन्मों को याद कर सकते हैं, साथ ही उन जीवनंों से सम्बन्धित स्थानों तथा संबंधियों को पहचानने में सक्षम होते हैं। यह ऐसा नहीं जो अतीत में कभी हुआ हो। आज भी ऐसे कई लोग पूर्व और पश्चिम में हैं जो अपने पूर्व जन्मों से सम्बन्धित घटनाओं और अनुभवों का स्मरण कर सकते हैं। इसको अस्वीकार करना शोध करने का एक सच्चा और निष्पक्ष तरीका नहीं है क्योंकि वह इस प्रमाण के विरुद्ध है। पुनर्जन्म पहचानने की तिब्बती व्यवस्था परीक्षण का एक प्रामाणिक तरीका है जो लोगों के पूर्व जन्मों के स्मरण पर आधारित है।

पुनर्जन्म कैसे होता है

मृत्यु के पश्चात कोई दो प्रकार से पुनर्जन्म ले सकता है ः पहला कर्म और क्लेश के प्रभाव से और दूसरा करुणा और प्रणिधान के माध्यम से। पहले के संबंध में अविद्या के कारण पाप पुण्य द्वारा एकत्रित कर्मों का वासना विज्ञान पर रखते हैं। मृत्यु के समय तृष्णा, उपादान तथा भव द्वारा पोषित वे आगामी जीवन की ओर धकेलते हैं । फिर हम विवश होकर उच्च अथवा निम्न लोकों में जन्म लेते हैं। इस तरह साधारण सत्व अरघट्ट की तरह परतन्त्र होकर जन्म और मरण की चक्र में निरंतर घूमने रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भी साधारण प्राणी अपने दैनिक जीवन में कुशल कर्मों की अभ्यासों में परिश्रम से मृत्यु के समय कुशल कर्म द्वारा पोषित से उच्च लोक में जन्म ले सकते हैं। दूसरी ओर, आर्य मार्ग प्राप्त बोधिसत्व अपना पुनर्जन्म उनके कर्मों तथा क्लेशों के कारण नहीं अपितु सत्वों के प्रति करुणा से उनके कल्याण हेतु उनकी प्रणिधान पर आधारित होता है। वे अपने जन्म का स्थान, समय और साथ ही अपने भविष्य के माता - पिता का चयन करने में सक्षम होते हैं।

टुल्कु का अर्थ

ऐसा प्रतीत होता है कि पहचान किए गए अवतारों के लिए टुल्कु (निर्माण काय) उपाधि लगाने की तिब्बती परम्परा का प्रारंभ उस समय हुआ, जब भक्तों ने इसका उपयोग एक सम्मान के रूप में किया, पर तब से यह एक साधारण अभिव्यक्ति हो गई है। साधारणतया टुल्कु शब्द पारमिता यान में वर्णित बुद्ध के तीन या चार प्रकार के काय में से एक का नाम है। वह भी सभी बन्धनों से युक्त व्यक्ति महायान में प्रवेश करके पुण्य तथा ज्ञान सम्भार से आगन्तुक मल क्लेश और ज्ञेय आवरण को वासना सहित प्रहाण करके विमल चित्त द्वारा सभी धर्म को प्रत्यक्ष देखते हैं उसे ज्ञानधर्मकाय और उस प्रकार के चित्तधर्मता को स्वभाव काय कहते हैं। वह स्वार्थ निष्ठा काय अथवा धर्मकाय है।  परन्तु वह काय केवल परस्पर बुद्धों में दिखाई देते हैं और दूसरों को दिखाई नहीं देते। अतः परार्थ साधना के लिए अन्यों को दिखाई देने वाले रूप काय अवश्यंभावी है। इसलिए भूमि प्रतिष्ठित बोधिसत्त्व को दिखाई दे और अकनिष्ठ पुर में विराजमान आदि पाँच नियत की रूपकाय पर्यन्त को सम्भोग काय और उसके द्वारा साधारण पृथग्जनों को भी दिखाई देने वाले देवता और मनुष्य आदि रूपों में निर्माण करते हैं, वह निर्माण काय है। इन दोनों को परार्थ रूप काय कहते हैं।

निर्माणकाय के तीन रूप हैं: क) लक्षण और अनुव्यंजन से अलंकृत तथा स्थान और समय विशेष में उत्पन्न आदि बारह कृत्य करने वाले उत्तम निर्माण जैसे हमारे शास्ता शाक्यसिंह की तरह।  ख) शिल्प स्थान के माध्यम से जगत् हित करने वाले शिल्प निर्माण कार्य। ग) देवता, मनुष्य, तिर्यक्, नदी, पुल, औषधि, वृक्ष आदि के माध्यम से जगत् हित करने वाले जन्म निर्माण काय। इन तीन प्रकार के निर्माणकायंों में तिब्बत में आध्यात्मिक आचार्यों के अवतारों की पहचान और टुल्कु के रूप में कहलाना जन्म निर्माण काय के अंतर्गत आता है। इन टुल्कुओं में ऐसे कई हो सकते हैं जो बुद्ध के सच्चे जन्म निर्माणकाय हों पर यह आवश्यक नहीं कि यह उन सभी पर लागू हो। तिब्बत के टुल्कुओं में शैक्ष आर्य और पृथग्जन के सम्भार मार्गी, प्रयोग मार्गी और अब तक मार्ग में प्रवेश न हुआ हो ऐसा कोई भी संभव है। अतः उन लोगों को समान तथा सम्बन्धित होने के कारण टुल्कु के नाम से सम्बोधित करते हैं।

जैसा जमयंग खेंचे वांगपो मानते हैं कि ः

"जन्म वह होता है जब पूर्व की काय को त्यागकर दूसरा ग्रहण करता है, निर्माण वह है जब निर्माण के आधार को न त्यागकर अन्य निर्माण को दिखाते हैं।"

पुनर्जन्म की पहचान

किसी के पूर्व जीवन के बारे में जानकर वर्णन करने की व्यवस्था उस समय से थी जब स्वयं शाक्यमुनि बुद्ध जीवित थे। विनय वस्तु, जातक, विज्ञमूर्ख सूत्र और कर्मशतक इत्यादि अधिकतर सूत्र और तंत्र में कई विवरण मिलते हैं जिसमें तथागत द्वारा  कर्मफल की व्यवस्था देते समय किस कर्म की संचय से आज इस फल का अनुभव किया जा रहा है, इसे विस्तार से दिखाया गया है। साथ ही भारतीय आचार्यों की जीवन कथाओं में जिनका जीवन बुद्ध के बाद था, कई अपने जन्म के पहले के स्थान को प्रकट करते हैं। ऐसी कई कहानियाँ हैं पर उनके पहचान और उनके अवतरण की संख्या की व्यवस्था भारत में नहीं हुई।

तिब्बत में पुनर्जन्म पहचानने की व्यवस्था


बौद्ध धर्म के आगमन के पूर्व स्थानीय बॉन परंपरा में पूर्व और पर जन्म पर बल दिया जाता था। और तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार के बाद से, लगभग सभी तिब्बतियों ने पूर्व और पर जन्म में विश्वास किया है। कई आध्यात्मिक आचार्यों के पुनर्जन्म का परीक्षण करते हुए जिन्होंने धर्म को संभाल कर रखा, साथ ही बड़ी श्रद्धा से उनकी प्रार्थना करने की प्रथा तिब्बत में सब जगह फली फूली। स्थानीय तिब्बती पुस्तकें जैसे कि मणि कबुम और पंचवर्गीय कथंग शिक्षाएँ और ११ वीं सदी में आचार्य दीपांकर अतीश के  तिब्बत में रहते समय कहे हुए प्रश्नोत्तर मणिमाला, कदम्प पुत्रधर्म आदि आर्य अवलोकितेश्वर के जातक माला प्रदर्शित अनेक प्रामाणिक ग्रन्थ हुए। परन्तु औपचारिक रूप से पुनर्जन्म पहचानने की वर्तमान परंपरा का प्रारंभ १३वीं सदी में माना जाता है, जब करमापा पक्षी को उनके शिष्यों द्वारा करमापा दुसुम ख्येनपा का पुनर्जन्म मानकर श्रद्धा अर्पित करना आरंभ की।  तब से आठ सौ वर्षों से अधिक के दौरान सत्रह करमापा के पुनर्जन्म हो चुके हैं। इसी तरह १५वीं सदी में कुनगा संगमो को खांडो छोक्यी डोनमे की पुनर्जन्म के रूप में दी गई मान्यता के बाद से समदिंग दोर्जे फगमो के दस से अधिक पुनर्जन्म हो चुके हैं। तिब्बत में मान्यता प्राप्त टुल्कुओं में प्रव्रजित, तांत्रिक, पुरुष तथा महिला सभी हुए हैं। अवतारों को पहचानने की यह व्यवस्था क्रमशः तिब्बत में अन्य तिब्बती बौद्ध परंपराओं, बॉन आदि में भी फैली। आज सक्या, गेलुग, काग्यु, ञिङमा, जोनंग, बोदोंग और साथ ही बोन में मान्यता प्राप्त टुल्कु हैं जो धर्म की सेवा कर रहे हैं। यह भी सच है कि इन टुल्कुओं में कुछ निंदनीय भी हैं।

सर्वज्ञ गेदुन डुब, जो जे चोंखापा के प्रत्यक्ष शिष्य थे, ने चंग में टाशी ल्हुनपो विहार की स्थापना की और अपने शिष्यों का ध्यान रखा। १४७४ में ८४ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। यद्यपि प्रारंभ में उनके पुनर्जन्म की पहचान हेतु कोई प्रयास नहीं किए गए, पर एक बच्चे, जिसका नाम संज्ञे छोफेल था, जो चंग तनक (१४७६) में पैदा हुआ था, का अपने पूर्व जन्म के अद्भुत और दोष रहित स्मृतियों के कारण लोगों को उसकी पहचान करने के लिए बाध्य होना पड़ा। तब से गदेन फोडंग लबरंग और बाद में गदेन फोडंग सरकार द्वारा दलाई लामा के निरंतर अवतार के खोज की परंपरा प्रारंभ हुई।

पुनर्जन्म (अवतार) पहचानने के तरीके

टुल्कुओं को पहचानने की व्यवस्था के अस्तित्व में आने के पश्चात इस विषय में विभिन्न प्रक्रियाओं का विकास प्रारंभ हुआ। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कुछ पूर्ववर्ती के भविष्य बताने वाला पत्र और अन्य निर्देश और संभावित संकेत शामिल हैं, अवतार का अपने पूर्ववर्ती जीवन का एक विश्वसनीय स्मरण और उसके बारे में बोलना, अपने पूर्ववर्ती के वस्तुओं की पहचान और उन लोगों को पहचानना, जो उनके निकट थे। इनके अतिरिक्त अन्य तरीकों, जैसे विश्वसनीय आध्यात्मिक गुरुओं से उनकी भविष्यवाणी जानना साथ ही लौकिक भविष्यवाणी करने वालों से भविष्यवाणी जानना जो माध्यमों की बेसुधी अवस्था के रूप में प्रकट होते हैं और जो ल्हामो ल्हछो जैसे संरक्षकों के पवित्र झीलों, एक पवित्र झील जो ल्हासा के दक्षिण में है, में दिखने वाले दृश्यों को देखना।

जहाँ टुल्कु की पहचान के लिए एक से अधिक में संभावित उम्मीदवार होते हैं, और निश्चित करना कठिन हो जाता है, तो एक पवित्र मूर्ति के समक्ष सत्य की शक्ति पर आटा गेंद विधि (ज़ेन ताक) द्वारा अंतिम निर्णय लेने की एक विधि भी है।

पूर्ववर्ती के निधन से पहले अवतार (मा धे टुल्कु)

साधारणतया किसी अवतार के लिए आवश्यक है कि वह अपनी पूर्व मृत्यु के पश्चात एक मनुष्य के रूप में जन्म ले। साधारण प्राणी अपने निधन के पूर्व अपने पुनर्जन्म का प्रकटीकरण नहीं कर सकते। परन्तु भूमि स्थित आर्य, जो स्वयं को एक ही समय में सैकड़ों या हजारों की संख्या में प्रकट कर सकते हैं वे मृत्यु से पूर्व अपने पुनर्जन्म का प्रकटीकरण कर सकते हैं। टुल्कुओं में भी, एक ही चित्त संतति वाले टुल्कु, कर्म तथा प्रणिधान से सम्बद्ध टुल्कु,  अधिष्ठित टुल्कु आदि हैं।  

पुनर्जन्म लेने का मुख्य उद्देश्य पूर्ववर्ती के जीवन काल में शासन और सत्त्वों का अधूरे कार्य को पूर्ण करना है। यदि लामा पृथग्जन है तो एक ही चित्त संतति के स्थान पर अपने से कर्म तथा प्रणिधान से सम्बद्ध शुद्ध कर्मी अन्य को टुल्कु पहचानना अथवा अपने शिष्य या अन्य युवा को सम्प्रदाय की आज्ञा देकर टुल्कु पहचानना कुछ भी हो सकता है। अतः पृथग्जन में भी बिना एक ही संतति के पूर्ववर्ती के निधन के पहले टुल्कु हो सकते हैं।  यही नहीं, एक में भी एक समय पर काय, वाक् और चित्त आदि अनेक टुल्कु हुए हैं। हाल ही में निधन से पूर्व पहचाने टुल्कुओं में जैसे दुजोम जिगडल येशे दोर्जे तथा चोग्ये ठिछेन नवांग ख्येनरब आदि हो चुके हैं।

स्वर्ण कलश का उपयोग

जैसे जैसे पञ्च कषाय काल की वृद्धि होता जाता है, वैसे वैसे मान्यता प्राप्त उच्च लामाओं के टुल्कु भी बढ़ रही है। जिनमें से कुछ राजनैतिक उद्देश्यों के लिए हैं। इस तरह अनुचित और संदिग्ध साधनों के माध्यम से नकली टुल्कु की संख्या अधिक होने के परिणाम स्वरूप धर्म की भारी क्षति हो रही है।

सन् १७९१ से १७९३ तक हुए  तिब्बत और गोरखा के बीच युद्ध के दौरान तिब्बत सरकार को मंचू सैन्य सहायता माँगनी पड़ी थी। परिणामस्वरूप गोरखा सैनिकों को तिब्बत से भगा दिया गया था, पर बाद में मांचू अधिकारियों ने तिब्बत सरकार के प्रशासन को और अधिक कुशल बनाने के बहाने एक २९ सूत्रीय प्रस्ताव सुझाया। इस प्रस्ताव में दलाई लामा, पंचेन लामा तथा वरिष्ठ होथोगथू लामाओं की पुनर्जन्मों की मान्यता स्वर्ण कलश के माध्यम से तय करने के सुझाव शामिल थे। इसलिए दलाई लामा और पंचेन लामा के कुछ तथा अन्य उच्च लामाओं के कुछ पुनर्जन्मों को पहचानने में इस प्रक्रिया का पालन किया गया। यही नहीं, स्वर्ण कलश विधि को आठवें दलाई लामा जम्पल ज्ञाछो द्वारा लिखा गया था। इस प्रकार की व्यवस्था आरंभ के बाद भी , इसका पालन नवें, तेरहवें और मेरे, चौदहवें दलाई लामा के लिए नहीं किया गया।

यहाँ तक ​​कि दसवीं दलाई लामा के मामले में, प्रामाणिक पुनर्जन्म पहले से ही ढूँढा जा चुका था और वास्तव में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, पर केवल मंचुओं को प्रसन्न करने के लिए यह घोषणा कर दी गई कि इस प्रक्रिया का पालन हुआ है।

स्वर्ण कलश की प्रक्रिया वास्तव में केवल ग्यारहवें व बारहवें दलाई लामा के लिए प्रयोग में लाई गई थी। पर इस प्रणाली के प्रयोग से पहले ही बारहवें दलाई लामा को मान्यता दे दी गई थी। इसलिए एक ही में इस प्रणाली का उपयोग किया गया। इसी प्रकार पंचेन लामा के पुनर्जन्मों में आठवें और नौवें के अतिरिक्त ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ यह प्रणाली काम में लाई गई हो। यह प्रणाली मंचुओं द्वारा थोपी गई थी इसलिए तिब्बतियों का उस में कोई विश्वास नहीं था। क्योंकि इसमें किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक गुणवत्ता का अभाव था। यदि इसका ईमानदारी से उपयोग किया जाता तो ऐसा प्रतीत होता है कि हम इसे आटा गेंद विधि उपाय (ज़ेन तक) के रूप में सोच सकते हैं।

सन् १८८० में, बारहवें के पुनर्जन्म के रूप में तेरहवें दलाई लामा की मान्यता के दौरान, तिब्बत और मंचू के बीच पुजारी - संरक्षक का संबंध तब टूटा नहीं था। उस समय मंचू का प्रभाव किंचित बचा था, फिर भी बिना किसी त्रुटि के आठवीं पंचेन लामा को नेचुंग और सम्ये धर्मपालकों के भविष्यवाणियाँ और ल्हामो लाछो दर्शन द्वारा उनके पुनर्जन्म के रूप को मान्यता दी गई थी, इसलिए स्वर्ण कलश प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। यह स्पष्ट रूप से तेरहवें दलाई लामा के जल - बंदर वर्ष (१९३३) के मुखोपदेश से समझा जा सकता है:

 "मुझे पूर्व रीति के अनुसार स्वर्ण कलश से नहीं चुना गया। मेरा चयन भविष्यवाणी की परीक्षण से स्पष्ट हुआ है। इस तरह मुझे दलाई लामा के रूप में मान्यता दी गई और राजसिंहासन पर आसीन किया गया।"

जब १९३९ में मुझे चौदहवें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में पहचाना गया तो तिब्बत और चीन के बीच पुजारी - संरक्षक का संबंध पहले से समाप्त हो चुके थे। इसलिए स्वर्ण कलश के माध्यम से पुनर्जन्म की पुष्टि की कोई आवश्यकता का कोई प्रश्न न था। यह सर्वविदित है कि उस समय तिब्बत के राजप्रतिनिधि और तिब्बती राष्ट्रीय सभा ने दलाई लामा के पुनर्जन्म को पहचानने की प्रक्रिया, उच्च लामाओं तथा धर्मपालकों की भविष्यवाणियों और ल्हामो लाछो में देखे गए दृश्यों के आधार पर किया था, इसमें चीनियों की कोई भूमिका न थी। परन्तु बाद में चीनी गणतंत्र के कुछ संबंधित अधिकारियों ने चालाकी से समाचार पत्रंों में झूठ फैलाया कि   स्वर्ण कलश के  उपयोग को  नकारने  की सम्मति दे दी गई थी  और वू चुंगशिन ने  मेरे आसन ग्रहण समारोह की अध्यक्षता की थी इत्यादि। इस झूठ को तिब्बत स्वायत्तशासी के पांचवें पीपुल्स कांग्रेस के दूसरे सत्र में ३१ जुलाई १९८९ को ङफो नवांग जिग्मे ने, जो नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति के वाइस चेयरमैन हैं और जिनको चीन की पीपुल्स रिपब्लिक सबसे प्रगतिशील व्यक्ति मानती है, सामने लाए। उन्होंने लिखित साक्ष्यों को प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण के अंत में जो कहा उससे हम स्पष्ट  रूप से समझ सकते हैं:

"कम्युनिस्ट पार्टी को गुओमिंतंग द्वारा कहे गये झूठ को बनाए रखने की क्या आवश्यकता है?"

भ्रामक रणनीति और झूठी आशाएँ

इस बीच धनाढ्य लबरंग के कुछ कोषाध्यक्षों  ने  जो धर्म से अछूते और इह लोक के राग द्वेष से मत्त हैें, जिन्होंने अधर्म के माध्यम से पुनर्जन्म को ढूँढा है, वास्तव में  शासन, संघ तथा समाज को क्षति पहुँचायी है। इसके अतिरिक्त मंचू के समय से लेकर चीनी राजनीतिक शासकों ने बार बार तिब्बत और मंगोलिया के विषयों में अडंगा डालने के लिए धर्म और लामा टूल्कूओं को राजनैतिक हथियार के रूप में प्रयोग करके विभिन्न छलपूर्ण तरीका अपनाया है। आज चीन की पीपुल्स गणराज्य के सत्तावादी शासक भी, जो अपने को साम्यवादी कहते हैं और धर्म को अस्वीकार करते हैं, धार्मिक मामलों मे दखल देकर कथित राष्ट्र प्रिय - धर्म प्रिय का आदेश थोप रहे हैं और १ सितंबर २००७ से लागू हुई तथाकथित आदेश संख्या पांच की घोषणा की है, जो तिब्बती बौद्ध परम्परा में लामाओं की पुनर्जन्म की मान्यता और नियंत्रण से जुड़ी है। यह लज्जाजनक व हास्यपद है। फिर भी हमारे अद्वितीय तिब्बती सांस्कृतिक परंपराओं के उन्मूलन के षड्यन्त्र के तहत लामाओं के पुनर्जन्म को पहचानने में विविध अनुचित उपायों को लागू करके समस्त तिब्बतियों की दिल में एक ऐसा घाव बनाये हैं और बना भी रहे हैं जिसका उपचार बहुत कठिन हैं। और तो और वे मेरी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिससे वे अपनी पसंद के अनुसार पंद्रहवें दलाई लामा को मान्यता देकर तिब्बत तथा तिब्बती बौद्ध परम्परा के अनुयायी समेत विश्व समुदाय को धोखा देने की गहरी षड्यन्त्र की पुष्टि हाल ही के नियमों और घोषणाओं से स्पष्ट हो चुकी है। अतः धर्म और जगत् की तात्कालिक एवं दूरगामी समस्त कल्याण को दृष्टि में रखते हुए इस प्रकार की षड्यन्त्र को रोकना मेरा उत्तरदायित्व है, इसलिए मैं निम्नलिखित घोषणा करता हूँ।

दलाई लामा का अगला अवतार

जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, पुनर्जन्म या तो पूर्ववर्ती अपनी स्वतंत्रता से अथवा कम से कम उसके कर्म, पुण्य और प्रणिधान के वशीभूत होकर लेना पड़ता है। अतः वह कहाँ और कैसे उत्पन्न होगा। किस माध्यम से पहचाना जायेगा आदि  पुनर्जन्म लेने वाले व्यक्ति स्वयं का विशिष्ट अधिकार है। यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसके िलए कोई भी उस व्यक्ति पर ज़ोर या दबाव नहीं डाल सकता न ही हेरफेर कर सकता है। यह विशिष्ट रूप से चीनी शासकों के लिए अनुचित है कि वे सामान्यतः लामाओं की पुनर्जन्म में और विशेषकर वे दलाई लामा तथा पंचेन लामा के पुनर्जन्म में हस्तक्षेप करें, जो यहाँ तक कि खुल कर पिछले और आगामी जीवन के विचार को अस्वीकार करते हैं, टुल्कु व्यवस्था की बात तो बहुत दूर की है। इस तरह लोगों के समक्ष स्पष्ट हो चुका है कि वे अपनी राजनीतिक विचारधारा के विपरीत ही नहीं अपितु वे कितने निर्लज्ज और नीच है। यदि इस प्रकार का हस्तक्षेप हुआ तो समस्त तिब्बती और तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुयायी इसे कदापि न मानेंगे और न ही स्वीकार करेंगे।  

जब मैं जे गेदुन डुब की उम्र, लगभग नब्बे, का हूँगा तो मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के उच्च लामाओं, तिब्बती समेत तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले संबंधित लोगों से विचार - विमर्श करके निर्णय लूँगा कि दलाई लामा की परम्परा को जारी रखना चाहिए या नहीं । यदि यह निश्चय हुआ कि दलाई लामा का पुनर्जन्म बना रहना चाहिए और एक पंद्रहवीं दलाई लामा की पहचानने की आवश्यकता है तो उस कार्य का प्रमुख उत्तरदायित्व दलाई लामा के गदेन फोडंग न्यास के संबंधित अधिकारियों पर होगा। उन्हें तिब्बती बौद्ध परंपराओं के विभिन्न प्रमुखों और दलाई लामाओं के साथ छाया की तरह जुड़े हुए धर्मपालकों से परामर्श करके पूर्व प्रक्रिया तथा मान्यताओं की भाँति करना होगा। मैं भी इस विषय में स्पष्ट लिखित निर्देश छोड़ूँगा। यह ध्यान रखें कि ऐसे वैध उपायों के माध्यम से मान्यता प्राप्त पुनर्जन्म के अतिरिक्त चीनी शासक समेत किसी भी शासक द्वारा किसी राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चुने व्यक्ति को कोई मान्यता या स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए।

दलाई लामा
धर्मशाला
२४ सितंबर २०११

 

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